दगाबाज दोस्त- दोस्ती में दुश्मनी की डरावनी कहानी

Written By Vivek Pandey, Horror Story

मैं, विनय और मनोज काफी अच्छे दोस्त थे। हम तीनों दिल्ली की एक मल्टीनेशनल कंपनी में साथ में काम करते थे। हम तीनों उस कंपनी में जूनियर डेवलपर थे। तीनों की जॉइनिंग साथ ही हुई थी। जॉइनिंग के तुरंत बाद से ही हममें काफी अच्छी दोस्ती हो गई थी। हम साथ साथ ऑफिस जाते, साथ साथ खाना खाते और साथ में ही घूमने भी जाया करते थे।

पिछले साल तक सब कुछ बढ़िया चल रहा था। लेकिन नया साल आते-आते कंपनी में काम काफी बढ़ गया। कंपनी ने नए लोगों को हायर करना बंद कर दिया। जिसकी वजह से बढ़े हुए काम का सारा दबाव हम तीनों के ऊपर आ गया था। नौबत यह आ गई थी कि काम समय से पूरा करने के लिए हमें कंपनी के निश्चित किए गए घंटों से अधिक काम करना पड़ता था।

मैं और मनोज देर रात तक ऑफिस में बैठकर काम किया करते थे। लेकिन विनय को यह ओवरटाइम करना बिल्कुल भी पसंद नहीं था। उसे ऑफिस के काम से ज्यादा, घर बैठकर आराम करना व पार्टी करना पसंद था। इसलिए जब मैं और मनोज ऑफिस शिफ्ट खत्म होने के बाद बाकी बचा काम करने के लिए ऑफिस में रुका करते थे, तब विनय अपने घर चले जाता था। उसे ऑफिस के घंटों के अलावा काम करना अच्छा नहीं लगता था।

उस समय ओवरटाइम करना हमारी मजबूरी भी थी। क्योंकि अगर हम समय से काम पूरा नहीं करते तो कंपनी हमें नौकरी से निकाल देती और हमारी जगह किसी और को भर्ती कर लेती। वायरस के कारण नौकरियां वैसे ही कम हो रही थी। इसलिए हम बेरोजगार होना कतई नहीं सह सकते थे।

लेकिन विनय यह बातें नहीं समझता था। उसके अनुसार ओवरटाइम करना हमारी बेवकूफी थी। वह रोज काम अधूरा छोड़ कर चला जाता था, जिसके कारण मुझे और मनोज को उसका बचा हुआ काम पूरा करना पड़ता था क्योंकि हम तीनों आखिर एक ही टीम में थे। हम देर रात तक ऑफिस में रुक कर काम करते थे, जिस कारण हमने सारे प्रोजेक्ट समय पर पूरे कर दिए थे।

हमारा बॉस हम दोनों से और खासकर मनोज से काफी खुश रहता था। उसने कई बार ऑफिस में सबके सामने मनोज की तारीफ भी की। हमारे बॉस के हिसाब से मनोज उस कंपनी का बेस्ट एम्पलाई था। यह सब देखकर धीरे-धीरे विनय मनोज से चिढ़ने लगा। विनय को लगता था कि मनोज से अच्छा काम तो वह कर लेता है। फिर भी पता नहीं क्यों बॉस हमेशा मनोज की ही तारीफ करते हैं। लेकिन विनय यह भूल गया था कि वह मनोज ही था जो देर रात तक ऑफिस में रुक कर विनय के हिस्से का काम भी किया करता था।

मनोज के लिए विनय की ईर्ष्या धीरे-धीरे विशाल रूप लेने लगी थी। विनय मनोज को हमेशा गुस्से से देखा करता था। दोनों में कई बार काफी तू-तू मैं-मैं भी हो जाती थी। मनोज के लिए विनय के मन में बहुत नफरत भर चुकी थी। वह विनय को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगा था। जबकि इसके विपरीत, विनय के मन में ऐसा कुछ भी नहीं था। वह जानता था कि ऑफिस में होने वाली उसकी तारीफ सुनकर विनय बस उससे जलता है। उसे लगता था कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।

परंतु मनोज की सोच से उलट चीजें बिगड़ती ही रही। स्थिति सबसे खराब तब हुई जब बॉस ने विनय की जगह मनोज को प्रमोशन दे दिया। वह मनोज की मेहनत और लगन देखकर काफी खुश थे। मनोज के प्रमोशन के बारे में जानकर विनय आग बबूला हो गया। मनोज के खिलाफ उसकी जलन ने उसे अंधा कर दिया था। उसके सर पर मनोज को मारने का भूत सवार हो गया। ऑफिस में वह मनोज को कुछ नहीं कर सकता था। इसलिए उसने सबके सामने अच्छा बनने का नाटक किया और मनोज को बधाई दी।

इसके ठीक दो दिन बाद हम ऑफिस से काम निपटा कर घर जा रहे थे कि तभी विनय हमारे पास आया। वह बोला, "राहुल, मनोज क्यों ना आज हम पहले की तरह घूमने जाएं। शहर से बाहर लॉन्ग ड्राइव पर जाएंगे और खूब मजे करेंगे"। मुझे यह कुछ अजीब लगा। जो इंसान कल तक मनोज को मारने के बारे में सोच रहा था, वह आज उसके साथ घूमने जाने की बात कर रहा है। ऐसा कैसे?

लेकिन फिर मनोज ने मुझे समझाया, "राहुल, लगता है विनय को अपनी गलतियों का एहसास हो गया है और शायद वह सब कुछ पहले जैसा कर देना चाहता है। इसलिए तुम ज्यादा मत सोचो और लॉन्ग ड्राइव पर जाने के लिए तैयार हो जाओ"। मैंने उसकी बात मान ली।

हम तीनों विनय की गाड़ी में लॉन्ग ड्राइव के लिए चल दिए। कुछ ही समय बाद हम शहर से बाहर आ गए और एक सुनसान रास्ते पर चलने लगे। रात के 11:00 बज रहे थे इसलिए उस रास्ते पर कोई भी नहीं था। थोड़ी ही दूर जाने पर विनय ने यमुना नदी पर बने एक पुल पर गाड़ी रोक दी। वह बोला "क्यों ना हम कुछ समय इसी जगह पर बिताएं। यहां पर नदी के पानी के कारण काफी ठंडी हवाएं भी चल रही हैं।"

हम तीनों गाड़ी से उतर गए और पुल की रेलिंग पर खड़े होकर नदी के पानी को निहारने लगे। तभी विनय ने मुझसे कहा, "राहुल, मैंने गाड़ी की डिग्गी में कुछ कोल्ड ड्रिंक्स की बोतल और चिप्स रखे हैं, प्लीज उन्हें निकाल लाओ।" मैं गाड़ी की तरफ जाने लगा। मेरे पीछे मुड़ते ही विनय ने एक जोर का धक्का देकर मनोज को पुल से नीचे गिरा दिया।

मैं दौड़ कर रेलिंग के पास गया। मनोज मेरी आंखों के सामने डूब रहा था और मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। यमुना का पानी काफी ज्यादा था और मुझे तैरना भी नहीं आता था। मनोज "राहुल मुझे बचाओ", "राहुल मुझे बचाओ" चिल्ला रहा था। देखते देखते वह मेरे सामने डूब कर मर गया और मैं कुछ नहीं कर पाया।

मैंने गुस्से से विनय की तरफ देखा और कहा, "विनय, यह तुमने क्या किया? क्यों मारा तुमने मनोज को धक्का"? इतना सुनते ही विनय बौखला गया। उसने गुस्से में आकर मेरा गला पकड़ दिया। वह बोला, "खुशी मनाओ कि तुम को धक्का नहीं मारा। तुम मेरे दोस्त हो इसलिए छोड़ रहा हूं। लेकिन खबरदार जो यह बात किसी को बताई। वरना मैं तुम्हें भी जिंदा नहीं छोडूंगा"।

मैं विनय की धमकी से काफी डर गया था। मैं चुपचाप उसके साथ गाड़ी में बैठकर घर वापस आ गया। रास्ते भर मेरी आंखों के सामने डूबते हुए मनोज की ही तस्वीर थी। "राहुल मुझे बचाओ", "राहुल मुझे बचाओ", मेरे कानों में यह शब्द गूंज रहे थे। घर आकर मैं बिना खाना खाए अपने बिस्तर पर लेट गया। मैं यकीन नहीं कर पा रहा था कि मनोज अब जिंदा नहीं है।

मुझे डर लग रहा था कि अगर मैंने किसी को कुछ बताया तो विनय मुझे भी मार डालेगा। मैं अगले कुछ दिनों तक ऑफिस नहीं गया। विनय ने ऑफिस में सबको यह बताया कि मनोज पुल से नीचे फिसल गया और पानी में डूब कर उसकी मौत हो गई। किसी ने भी विनय पर शक नहीं किया।

उस दिन के बाद से हर रात मुझे मनोज के सपने आने लगे। मनोज मेरे सपनों में आकर "राहुल मुझे बचाओ", "राहुल मुझे बचाओ" कहता था। करीबन चार दिन बाद मैंने ऑफिस जाने की हिम्मत की। विनय को विश्वास था कि उसकी धमकी के डर से मैं मनोज वाली बात किसी को नहीं बताऊंगा। मैं और विनय फिर साथ ही काम करने लगे। मनोज की जगह अब विनय को प्रमोशन मिल गया था।

एक रात मैं और विनय ऑफिस में अकेले काम कर रहे थे। मैं टॉयलेट करने के लिए ऑफिस के वाशरूम में गया। जैसे ही मैं टॉयलेट से बाहर आया, मेरी आँखें फटी की फटी रह गई। डर के कारण मेरी हालत खराब हो गई। वॉशरूम के शीशे पर किसी ने "राहुल, तुमने मुझे बचाया क्यों नहीं" लिखा था। मेरे दिल की धड़कने एकाएक तेज हो गई। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वहाँ क्या हो रहा है।

मैं वहां से भागकर ऑफिस की तरफ गया और विनय को यह बात बताई। विनय को लगा कि मैं बस उसे डराने के लिए यह सब कह रहा हूं। उसने मेरा विश्वास नहीं किया और मेरे साथ चलने से मना कर दिया। मैं भी चुपचाप अपना काम करने लगा।

कुछ समय बाद अचानक मेरे कंप्यूटर की स्क्रीन काली हो गई। स्क्रीन में भी टॉयलेट के शीशे की तरह "राहुल, तुमने मुझे बचाया क्यों नहीं?" लिखा हुआ था। वह देख कर मैं भौचक्का रह गया। वह देखते ही मैं पसीने से तरबतर हो गया। मुझे विश्वास हो गया कि यह सब मनोज की आत्मा ही कर रही है।

मैंने विनय को आवाज दी और उसे यह सब बताया। पहले की तरह ही उसे मुझ पर बिल्कुल भी यकीन नहीं हुआ। वह बोला, "रुको, मैं आकर देखता हूं"। जैसे ही वह मेरे कंप्यूटर के पास आया, अचानक से सब कुछ पहले जैसा हो गया। मैं हैरान था। डर के मारे मेरे हाथ पैर कांपने लगे।

विनय को लगा कि या तो मैं खुद पागल हो गया हूं या उसे बना रहा हूं। वह बोला "चलो राहुल, हम यह काम कल कर लेंगे। अभी मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं"। मैं और विनय घर के लिए निकल गए। विनय गाड़ी उस ही पुल वाले रास्ते की तरफ ले जा रहा था जहां से उसने मनोज को धक्का दिया था। अब मेरी दिल की धड़कन मेरे काबू में नहीं थी। मुझे लगने लगा कि विनय मुझे भी उस पुल से नीचे धक्का मार देगा।

उसने बीच पुल में गाड़ी रोकी और बाहर निकल कर मुझसे बोला, "राहुल, बाहर आ जाओ। थोड़ी देर यहां ठंडी हवा में सांस ले लेते हैं"। अब मेरा डर यकीन में बदल रहा था। मैंने उसे कुछ जवाब नहीं दिया। वह समझ गया कि मैं बाहर क्यों नहीं आ रहा हूं। वह फिर बोला, "डरो नहीं राहुल, मैं तुम्हें कुछ नहीं करूंगा। तुम बाहर आ जाओ। तुम्हें ठंडी हवा में सांस लेने की जरूरत है"।

मैं डरते डरते गाड़ी से बाहर आया और उसके साथ पुल की रेलिंग पर खड़ा हो गया। तभी हमें पीछे से किसी के आने की आहट हुई। एक लंबी कद काठी वाला इंसान धीरे-धीरे हमारी तरफ बढ़ रहा था। पास आने पर उसका चेहरा एकदम साफ दिखाई दे रहा था। वह कोई और नहीं बल्कि हमारा दोस्त मनोज था।

मैं डर से एकदम सहम गया। मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। विनय ने हकलाते हुए मुझसे कहा, "राहुल, यह यह यह म म्मा म म्मा मनोज तो मर गया था। तो यह क कौ कौन है"? मैं उसे कुछ जवाब देने की स्थिति में नहीं था। ऐसा लग रहा था मानो किसी ने मेरी जुबान खींच ली हो। मैं एकदम सुन्न खड़ा था।

विनय ने फिर डरते हुए कहा, "कौन हो तुम? मनोज तो मर गया था ना"। उसके इन सवालों का जवाब दिए बिना मनोज हमारी तरफ बढ़ रहा था। हमारे पास आते ही उसने एक जोरदार धक्का मार कर विनय को पुल से नीचे गिरा दिया। विनय को गिरता हुआ देखकर मेरी जोर से चीख निकली "विनय","नहीं"।

इतने में मेरी नींद खुल गई। मैं बहुत हांफ रहा था। डर के मारे मैं पसीना पसीना हो गया था। मुझे समझ आ गया था कि वह बस एक बुरा सपना था। तब जा कर मेरी जान में जान आयी। मैंने भगवान का धन्यवाद दिया और बिस्तर से उठा।

तभी मेरे मोबाइल पर हमारे ऑफिस के एक साथी, रमेश का फोन आया। उसने मुझे बताया, "राहुल, आज ऑफिस में छुट्टी है, इसलिए तुम ऑफिस मत आना"। छुट्टी का कारण पूछने पर उसने जो बताया उसे सुनकर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। मेरे दिल की धड़कन जोर-जोर से मेरे कानों में गूंज रही थी और मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया था।

रमेश ने मुझे बताया कि विनय की मौत होने के कारण ऑफिस में एक दिन की छुट्टी है। मैंने जैसे-तैसे हिम्मत जुटाकर उससे पूछा, "क्या हुआ उसको? कैसे मरा विनय"? रमेश ने बताया, "शहर के बाहर यमुना नदी पर बने पुल के पास नदी में उसकी लाश मिली थी। शायद उसने आत्महत्या की हो या फिर किसी ने उसे धक्का दे दिया हो"।

बस फिर क्या था, इतना सुनते ही मेरे हाथ से फोन छूट कर नीचे गिर गया और मैं वहीं पर बेहोश हो गया।

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